Hometown
Hometown
फ़िलहाल मैं अपने घर हूँ और बहुत ठीक हूँ, कुछ प्रख्यात विश्वविद्यालों मैं मेरा चयन भी हो गया है अब आप ये पूछना चाहएँगे कि कौनसे मे , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, तेरी स्कूल और उच्च शिक्षा और भी एक दो मैं हो गया है लेकिन सही कहु तो इस वर्ष मेरा बिल्कुल कॉलेज की पढ़ाई या किसी के नीचे या नंबर्स का दवाव महसूस एनएचआई करना चाहता हूँ लेकिन देखिए क्या होता है। आजकल लगभग सभी मित्रो से मित्रता कम कर दी है जो की ठीक भी है। सभी मित्रता मोबाइल दुनिया से भी ख़ुद को अलग कर लिया है, जिसका असर मुझे दिख भी रहा है लेकिन जब चुपके से और ख़ुद से बचकर मैं जब किसी पुराने मित्र से बात करता हूँ तो लगता कहीं मैं धीरे तो नहीं चल रहा हूँ , लेकिन नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है।
आजकल मैं मंटो, फ़ैज़ साहब, गांधी, मर्क्स , लेनिन, विलियम कुछ भारत और दुनिया से संबंधित किताबों काफ़ी जोर से पढ़ रहा हूँ।
जैसे
और भी दुख है जामने मैं मोहब्बत के सिवा,
रहते और भी वस्ल की राहत के सिवा,
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
क्या खूब कहा है फ़ैज़ साहब ने, क्या आपने पढ़ा है फ़ैज़ साहब को? नहीं तो अभी जाकर पढ़िए और समझिए वह समाज और मोहब्बत को बहुत अलग समझते थे और ये बात भी ठीक है। खैर हम जो मानते है और जो मानना चाहते है ए=वह बिल्कुल अलग है नहीं मानते हो तो ख़ुद से पुछलेना।
मैं बग़ावत चाहता हूँ। हर उस फ़र्द के ख़िलाफ़ बग़ावत चाहता हूँ जो हमसे मेहनत कराता है मगर उसके दाम अदा नहीं करता। - सआदत हसन मंटो
काफ़ी लोगो ने बगावत का मतलब सरकार या किसी व्यक्ति की ख़िलाफ़ ले लिया होगा और आज की नई बात नहीं है बल्कि ये काफ़ी पुरानी रीति चली आधी है।
हम पेश आए की ख़त्म हो जाए मुल्क,
तुम बात कहो और हम न माने तो सुधार जाए मुल्क,
बात ख़त्म करके बर्दास्त की बात न कर वज़ीर, तू जाए तो हम आए मुल्क।
- अभय पांडे
ये मेरी लिखी हुए जो की मुझे लगता है की आप इससे नज़्म ही मान लीजिए।
Comments
Post a Comment